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ब्लू मिट्टी के बर्तन राजस्थान का प्रमुख उत्पादों में से एक है। नील रंग की मिट्टी के बर्तन बहुत सारे अलग-अलग रंगों में तैयार किये जाते है जैसे - पीले, गुलाबी और हरे रंग और भी की रंग उपलब्ध है।

ब्लू बर्तनों को कैसे बनाया गया है

नील रंग की मिट्टी के बर्तनों को फ़ारसी कला मुगल न्यायालयों के माध्यम से फारस और अफगानिस्तान से जयपुर के लिए तैयार किया जाता है।  ब्लू बर्तनों को क्वार्ट्ज से और मिट्टी से नहीं बनाया गया है। इसको बनाने में जो सामग्री उपयोग की जाती है कच्चे शीशा लगाना, क्वार्टज, सोडियम सल्फेट, और मुल्तानी मिट्टी (फुलर पृथ्वी) इन सब को शामिल करके ये बर्तन बनाये जाते है। नीले रंग के मिट्टी के बर्तनों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनमे जल्दी से दरारे नही आती है और ये जल्दी से टूटते नही है और नीले रंग के मिट्टी के बर्तन भी अभेद्य स्वच्छ, और दैनिक उपयोग के लिए उपयुक्त है।  ब्लू मिट्टी के बर्तनों को शानदार ब्रश लगाकर सजाया जाता है और इसको बहुत ही सफाई से तैयार किया जाता है।

कैसे ब्लू बर्तन अस्तित्व में आये

मुल्तानी मिट्टी से निर्मित मिट्टी के बर्तनों पर नील शीशे के आवरण का उपयोग करके मंगोल के कारीगर जो फारसी सजावटी कलाओं के साथ चीनी ग्लेज़िंग प्रौद्योगिकी में शामिल हो गए और उनके द्वारा इन बर्तनों की शुरुआत की गई थी। 14 वी सदी के प्रारभ में इस विधि को मुस्लिम शासक भारत से दक्षिण लेकर चले गए। इसका उपयोग प्रारंभिक वर्षों के दौरान मस्जिदों, मध्य एशिया और कब्रों में महलों को सुशोभित करने के लिए टाइल्स बनाने के लिए उपयोग किया गया था। बाद में इसका भारत में उपयोग कर मुगलो ने समरकंद में पहाड़ों के पार से उनके संरचनाओं की नकल करना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे नील  आवरण इस मिट्टी पर चढ़ाया गया और कश्मीरी कुम्हारो के द्वारा सजावट की वस्तुए तैयार की गई। वहां से फिर ये विधि दिल्ली के मैदान में ले गए और फिर 17 वीं शताब्दी  जयपुर लाया गया था। जयपुर के शासको का ब्लू बर्तनों के पक्षपाती थे, और रामबाग पैलेस में कई जगहों पर संगमरमर हॉल नीली टाइल्स के साथ बनाये गए और फव्वारे बनाये गए। फिर इन टाइलों का जयपुर के निर्माण में उपयोग किया गया था लेकिन वे बाद में गायब हो गया। विभिन्न सजावटी वस्तुओं पर चौंकाने वाली नीले रंग की डाई प्रत्येक और हर एक पर्यटन आकर्षित करती है। अब जयपुर में नीले मिट्टी के बर्तनों का काम होता है और कई सारे कारीगर इस काम को करते है और केवल इस कलाकृति से अपनी आजीविका कमा रहे हैं कारीगरों के इस काम के लिए प्रशिक्षित किया जाता है और अब जयपुर इस काम का एक केंद्रीय बिंदु बन गया है।

ब्लू बर्तनों आइटम

इन बर्तनों पर सामान्यत  काल की बेलबूटों के काम का पैटर्न, पक्षी डिजाइन और जानवरों से प्रेरित डिजाइन है। विभिन्न प्रकार की चीजे जैसे साबुन दानी व्यंजनो के लिए, प्लेटें, फूल फूलदान , सुराही  अर्थात छोटे घड़े, कोस्टर, ट्रे, फल कटोरे, चमकता हुआ टाइल इन सब पर हाथों से फूलो की डिजाइन और दरवाजो के दस्ते के चित्र बनाये जाते है। जयपुर में नीले मिस्र के पेस्ट से तैयार मिट्टी के बर्तनों का काम किया जाता है। इस मिट्टी के बर्तनों के कुछ पारदर्शी है और उन पर  पशु और पक्षी पैटर्न से रंगा हुआ है। इस सामान को कम तापमान पर  नाजुकता से तैयार किया जाता है। यहां पर मुख्य रूप से आकर्षक, फूलदान, ऐशट्रे, कोस्टर, और छोटे कटोरे और बक्से के आइटम तैयार किये जाते है। हालांकि कि कई गैर  परंपरागत रंग, पीले और भूरे रंग के होते है इनके रंग की प्लेट को नीले कोबाल्ट ऑक्साइड, तांबे ऑक्साइड को सफेद से हरे रंग में तैयार किया जाता है।

इन वर्षो में नील रंग के बर्तनों का काम पर्यटको के बीच में इतना ज्यादा लोकप्रिय नही है लेकिन फिर भी ये बड़ी सख्या में निर्यात किया जाता है। अब मिट्टी के बर्तनों का काम केवल निर्यात के उदेश्य से किया जाता है क्योकि अब यह भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को विकसित करने में मदद करता है

 


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